कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता बुझा सका है भला कौन वक्त के शोले ये ऐसी आग है जिसमें धुआं नहीं मिलता तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो जहां उमीद हो इसकी वहां नहीं मिलता कहां चिराग जलाएं कहां गुलाब रखें छतें तो मिलती हैं लेकिन मकां नहीं मिलता ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं ज़ बां मिली है मगर हमज़बां नहीं मिलता चिराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है खुद अपने घर में ही घर का निशां नहीं मिलता
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Showing posts from December, 2018
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रात के पिछले पहर मैंने वो सपना देखा खिलने से पहले, कली का वो मसलना देखा एक मासूम कली, कोख में मां के लेटी सिर्फ गुनाह कि नहीं बेटा, वो थी इक बेटी सोचे बाबुल कि जमाने में होगी हेटी बेटी आएगी पराए धन की एक पेटी सुबह-सांझ बाबा का बेटा-बेटा रटना देखा तन्हा मां के तब कलेजे का यूं फटना देखा दादी चाहे कि एक पोते की ही दादी वो बने दादा चाहे कि मेरे वंश में, बेटी न जने मां की मजबूरी, कि बिनती वो उल्टी ही गिने जां बचाने को कायरता में, हाथ खून ने सने खुद की लाचारी में एक मां का कलपना देखा आंखों से अश्क नहीं खून का टपकना देखा बेईमानी से उसे कोख में पहचाना गया फिर किसी जख़्म की मानिंद कुरेदा भी गया अनगढ़े हाथों को, पैरों को कुचल काटा गया नैनों को, होंठो को, गालों को नोंचा भी गया कितना आसान है, बेटी का यूं मरना देखा कोख में कत्ल हुई, बेटी का तड़पना देखा ...
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कहीं-कहीं से हर चेहरा तुम जैसा लगता है तुम को भूल न पाएंगे हम, ऐसा लगता है ऐसा भी इक रंग है जो करता है बातें भी जो भी इसको पहन ले वो अपना-सा लगता है तुम क्या बिछड़े भूल गए रिश्तों की शराफत हम जो भी मिलता है कुछ दिन ही अच्छा लगता है अब भी यूं मिलते हैं हमसे फूल चमेली के जैसे इनसे अपना कोई रिश्ता लगता है और तो सब कुछ ठीक है लेकिन कभी-कभी यूं ही चलता-फिरता शहर अचानक तन्हा लगता है
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सफर में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो यहां किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम संभल सको तो चलो हर इक सफर को है महफूज रास्तों की तलाश हिफाज़तों की रवायत बदल सको तो चलो यही है ज़िंदगी, कुछ ख्वाब, चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहां बदलती हैं तुम अपने आपको खुद ही बदल सको तो चलो #NidaFazli
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बेनाम-सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नहीं जाता सब कुछ तो है क्या ढूंढती रहती हैं निगाहें क्या बात है मैं वक्त पे घर क्यों नहीं जाता वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहां में जो दूर है वो दिल से उतर क्यों नहीं जाता मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा जाते हैं जिधर सब, मैं उधर क्यों नहीं जाता वो ख्वाब जो बरसों से न चेहरा, न बदन है वो ख्वाब हवाओं में बिखर क्यों नहीं जाता #Nida_Fazli
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कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता बुझा सका है भला कौन वक्त के शोले ये ऐसी आग है जिसमें धुआं नहीं मिलता तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो जहां उमीद हो इसकी वहां नहीं मिलता कहां चिराग जलाएं कहां गुलाब रखें छतें तो मिलती हैं लेकिन मकां नहीं मिलता ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं ज़बां मिली है मगर हमज़बां नहीं मिलता चिराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है खुद अपने घर में ही घर का निशां नहीं मिलता #Nida_Fazli
न मेरा है न तेरा है ये हिन्दुस्तान सबका है, नहीं समझी गई ये बात तो नुकसान सबका है।
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न मेरा है न तेरा है ये हिन्दुस्तान सबका है, नहीं समझी गई ये बात तो नुकसान सबका है। हज़ारों रास्ते खोजे गए उस तक पहुँचने के, मगर पहुँचे हुए ये कह गए भगवान सबका है। जो इसमें मिल गईं नदियाँ वे दिखलाई नहीं देतीं! महासागर बनाने में मगर एहसान सबका है!! अनेकों रंग, ख़ुशबू, नस्ल के फल-फूल पौधे हैं! मगर उपवन की इज्जत-आबरू ईमान सबका है!! हक़ीक़त आदमी की और झटका एक धरती का! जो लावारिस पड़ी है धूल में सामान सबका है!! ज़रा से प्यार को खुशियों की हर झोली तरसती है! मुकद्दर अपना-अपना है, मगर अरमान सबका है! उदय झूठी कहानी है सभी राजा और रानी की! जिसे हम वक़्त कहते हैं वही सुल्तान सबका है!!