"The Importance of Father" वालिद (Father) की अजमत
#बाप_की_अज़मत
एक शख़्स नबी करीम(स.अ) की ख़िदमत मे हाज़िर हुआ और उसने अपने बाप की शिकायत की के या रसूलल्लाह(स.अ) मेरा बाप मुझ से पूछता नहीं और मेरा सारा माल ख़्रच करदेता है.....!
आप(स.अ) ने उनके वालिदे मौहतरम को बुलवाया,
जब उनके वालिद को पता चला के मेरे बेटे ने रसूलुल्लाह(स.अ) से मेरी शिकायत की है तो दिल मे बोहौत रंजीदा हुऐ और रसूलुल्लाह(स.अ) की ख़िदमत मे हाज़री के लिये चलदिये.......!चूंकि अरब की घुट्टी मे शायेरी थी तो रासते मे कुछ अशआर कहते हुऐ पोंहचे..........!
इधर बारगाहे रिसालत मे पोंहौंचने से पहले "हज़रत जिबराईल(अ.स) आप(स.अ) की ख़िदमत मे हाज़िर हुऐ और फरमाया के अल्लाह सुबहानहु तआला ने फरमाया है के इंका मामला बाद मे सुनियेगा पहले वोह अशआर सुनैं जो वोह सोचते हुऐ आरहे हैं.........जब वोह हाज़िर हुऐ तो आप(स.अ) ने फरमाया के आपका मामला बाद मे सुना जायेगा पहले वोह अशआर सुनाईये जो आप सोचते हुऐ आये हैं..........!!!
वोह मुख़लिस सहाबी थे यह सुनकर रौने लगे के जो अशआर अभी मेरी ज़बान से अदा भी नहीं हुऐ मेरे कानौं ने भी नहीं सुने आप के रब ने सुन भी लिये और आपको बता भी दिया..........!!!
सहाबी ने अशआर पढने शुरू किये
ऐ मेरे बेटे जिस दिन तू पैदा हुआ
हमारी महनत के दिन भी शुरू होगये
तू रोता था हम सो नहीं सक्ते थे
तू नहीं खाता था हम खा नहीं सक्ते थे
तू बीमार होजाता तो तुझे लिये तबीब के पास इलाजो मुआलजे के लिये मारे मारे फिरते थे
के कहीं कुछ हो न जाये
कहीं मर न जाये
हालांके मौत अलग चीज़ है और बीमारी अलग चीज़
फिर तुझे गरमी से बचाने के लिये मैं दिन रात काम करता के मेरे बेटे को ठंडी छांव मिलजाये
तुझे ठंड से बचाने के लिये मैने पत्थर तोडे तग़ारियां उठाईं के मेरे बच्चे को गरमी मिलजाये
जो कमाया तेरे लिये
जो बचाया तेरे लिये
तेरी जवानी के ख़्वाब देखने के लिये मैंने दिन रात महनत की, अब मेरी हड्डियां कमज़ोर होगईं हैं लेकिन तू कडियल जवान होगया
फिर मुझ पर ख़िज़ां ने डेरे डाल लिये और तुझ पर बहार आ गई
मैं झुक गया
तू सीधा होगया
अब मेरी ख्वाहिश और मेरी उम्मीद पूरी हुई के अब तू हरा भरा होगया है
चल अब ज़िंदगी की आख़री सांसैं तेरी छांव मे बैठ कर गुज़ारूंगा
मगर यह किया जवानी आते ही तेरे तैवर बदल गऐ
तेरी आंखैं माथे पर चढ गईं
तू ऐसे बात करता है जैसे मेरा सीना फाड कर रख देता है
तू ऐसे बात करता है के कोई ग़ुलाम से भी बात नहीं करता
फिर मैने अपनी सारी ज़िंदगी की महनत को भुला दिया के मैं तेरा बाप नहीं नौकर हूं
नौकर को भी कोई ऐक वक़्त की रोटी दे ही देता है
तू नौकर समझ कर ही मुझे रोटी देदिया कर
.............................................आप(स.अ) यह अशआर सुनकर इतना रोये के आप(स.अ) की डाढी मुबारक तर होगई, आप(स.अ) अपनी जगह से उठे और उस बेटे का ग्रहबान पकड कर फरमाया
तू और तेरा सब कुछ तेरे बाप का है
तू और तेरा सब कुछ तेरे बाप का है
तू और तेरा सब कुछ तेरे बाप का है
.....................................................
एक शख़्स नबी करीम(स.अ) की ख़िदमत मे हाज़िर हुआ और उसने अपने बाप की शिकायत की के या रसूलल्लाह(स.अ) मेरा बाप मुझ से पूछता नहीं और मेरा सारा माल ख़्रच करदेता है.....!
आप(स.अ) ने उनके वालिदे मौहतरम को बुलवाया,
जब उनके वालिद को पता चला के मेरे बेटे ने रसूलुल्लाह(स.अ) से मेरी शिकायत की है तो दिल मे बोहौत रंजीदा हुऐ और रसूलुल्लाह(स.अ) की ख़िदमत मे हाज़री के लिये चलदिये.......!चूंकि अरब की घुट्टी मे शायेरी थी तो रासते मे कुछ अशआर कहते हुऐ पोंहचे..........!
इधर बारगाहे रिसालत मे पोंहौंचने से पहले "हज़रत जिबराईल(अ.स) आप(स.अ) की ख़िदमत मे हाज़िर हुऐ और फरमाया के अल्लाह सुबहानहु तआला ने फरमाया है के इंका मामला बाद मे सुनियेगा पहले वोह अशआर सुनैं जो वोह सोचते हुऐ आरहे हैं.........जब वोह हाज़िर हुऐ तो आप(स.अ) ने फरमाया के आपका मामला बाद मे सुना जायेगा पहले वोह अशआर सुनाईये जो आप सोचते हुऐ आये हैं..........!!!
वोह मुख़लिस सहाबी थे यह सुनकर रौने लगे के जो अशआर अभी मेरी ज़बान से अदा भी नहीं हुऐ मेरे कानौं ने भी नहीं सुने आप के रब ने सुन भी लिये और आपको बता भी दिया..........!!!
सहाबी ने अशआर पढने शुरू किये
ऐ मेरे बेटे जिस दिन तू पैदा हुआ
हमारी महनत के दिन भी शुरू होगये
तू रोता था हम सो नहीं सक्ते थे
तू नहीं खाता था हम खा नहीं सक्ते थे
तू बीमार होजाता तो तुझे लिये तबीब के पास इलाजो मुआलजे के लिये मारे मारे फिरते थे
के कहीं कुछ हो न जाये
कहीं मर न जाये
हालांके मौत अलग चीज़ है और बीमारी अलग चीज़
फिर तुझे गरमी से बचाने के लिये मैं दिन रात काम करता के मेरे बेटे को ठंडी छांव मिलजाये
तुझे ठंड से बचाने के लिये मैने पत्थर तोडे तग़ारियां उठाईं के मेरे बच्चे को गरमी मिलजाये
जो कमाया तेरे लिये
जो बचाया तेरे लिये
तेरी जवानी के ख़्वाब देखने के लिये मैंने दिन रात महनत की, अब मेरी हड्डियां कमज़ोर होगईं हैं लेकिन तू कडियल जवान होगया
फिर मुझ पर ख़िज़ां ने डेरे डाल लिये और तुझ पर बहार आ गई
मैं झुक गया
तू सीधा होगया
अब मेरी ख्वाहिश और मेरी उम्मीद पूरी हुई के अब तू हरा भरा होगया है
चल अब ज़िंदगी की आख़री सांसैं तेरी छांव मे बैठ कर गुज़ारूंगा
मगर यह किया जवानी आते ही तेरे तैवर बदल गऐ
तेरी आंखैं माथे पर चढ गईं
तू ऐसे बात करता है जैसे मेरा सीना फाड कर रख देता है
तू ऐसे बात करता है के कोई ग़ुलाम से भी बात नहीं करता
फिर मैने अपनी सारी ज़िंदगी की महनत को भुला दिया के मैं तेरा बाप नहीं नौकर हूं
नौकर को भी कोई ऐक वक़्त की रोटी दे ही देता है
तू नौकर समझ कर ही मुझे रोटी देदिया कर
.............................................आप(स.अ) यह अशआर सुनकर इतना रोये के आप(स.अ) की डाढी मुबारक तर होगई, आप(स.अ) अपनी जगह से उठे और उस बेटे का ग्रहबान पकड कर फरमाया
तू और तेरा सब कुछ तेरे बाप का है
तू और तेरा सब कुछ तेरे बाप का है
तू और तेरा सब कुछ तेरे बाप का है
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