दी अज़ानें कभी योरोप के कलीशाओं में, कभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सेहराओं में!
"थे हमीं एक तेरे मअर का आराओं में,
खुश्कियों में कभी लड़ते, कभी दरियाओं में,
दी अज़ानें कभी यूरोप के कलीशाओं में,
कभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सेहराओं में!
शान आँखों में न जँचती थी जहाँदारों की,
कलमा पढ़ते थे हम छाँव में तलवारों की!!"
~अल्लामा इक़बाल रह.
खुश्कियों में कभी लड़ते, कभी दरियाओं में,
दी अज़ानें कभी यूरोप के कलीशाओं में,
कभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सेहराओं में!
शान आँखों में न जँचती थी जहाँदारों की,
कलमा पढ़ते थे हम छाँव में तलवारों की!!"
~अल्लामा इक़बाल रह.
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